मैं नहीं मानता तुम जा रहे हो
रोज़ ये बता कर मुस्कुरा रहे हो
पूछते हो मुझसे कैसा लगेगा तुझे
मैं हँस के तुम्हें टाल देता हूँ
तुम कहते हो कुछ तो बोलो
मैं बोलता ज़रूर, फिर चुप ना होता
जो इतनी बातों का समय होता
रोज़ ये बता कर मुस्कुरा रहे हो
पूछते हो मुझसे कैसा लगेगा तुझे
मैं हँस के तुम्हें टाल देता हूँ
तुम कहते हो कुछ तो बोलो
मैं बोलता ज़रूर, फिर चुप ना होता
जो इतनी बातों का समय होता
मुझे नहीं लगता तुम्हारी याद आएगी
तुम्हें यकीन है वो मुझे बहुत सताएगी
मारते हो ताना, भुला दूँगा तुम्हें
मैं बस तुमसे ये सवाल करता हूँ
कितनी दूर जा रहे हो, क्या लौटोगे कभी
तुम बताते जो तुम्हें पता होता
जो इतनी बातों का समय होता
कितनी दूर जा रहे हो, क्या लौटोगे कभी
तुम बताते जो तुम्हें पता होता
जो इतनी बातों का समय होता
मैं नहीं सोचता कोई और आएगा
तुम्हारी जगह कोई ले पाएगा
चिढ़ाते हो मुझे, नये दोस्त बनेंगे
मैं चुप रह कर सोचता हूँ
क्या इतना आसान है किसी से जुड़ जाना
शायद हाँ, अगर सौ सालों की बातों का एक हफ़्ता होता
जो इतनी बातों का समय होता